क्या आपने कभी सोचा था कि एक वक्त जिस बीएड डिग्री को लाखों छात्र अपने करियर की नींव मानते थे, उसी के लिए आवेदन करने वाले छात्रों की संख्या अचानक इतनी तेज़ी से घट जाएगी? राजस्थान में वर्ष 2026 के आंकड़े देखकर शिक्षा जगत से जुड़े हर व्यक्ति को हैरानी हो रही है। प्री टीचर एजुकेशन टेस्ट (PTET 2026) में इस साल 21 मार्च तक केवल 65 हजार आवेदन ही प्राप्त हुए, जबकि मात्र तीन साल पहले यही संख्या 5.21 लाख थी। यह आंकड़ा सिर्फ एक परीक्षा की गिरावट नहीं है, बल्कि यह भारतीय युवाओं की बदलती सोच, बदलती प्राथमिकताओं और बदलते करियर विकल्पों की पूरी कहानी बयान करता है।

PTET में 4 साल में भारी गिरावट: क्या कहते हैं आंकड़े?
राजस्थान में बीएड प्रवेश परीक्षा PTET के बीते चार वर्षों के आंकड़े इस बदलाव की साफ तस्वीर पेश करते हैं। जहाँ 2023 में 5.21 लाख छात्रों ने इस परीक्षा के लिए पंजीकरण कराया था, वहीं 2024 में यह संख्या घटकर 4.27 लाख, 2025 में 2.45 लाख और 2026 में महज 65 हजार रह गई। यह गिरावट एक झटके में नहीं आई, बल्कि हर साल लगातार छात्र इस परीक्षा से दूरी बनाते चले गए।
| वर्ष | PTET रजिस्ट्रेशन |
| 2023 | 5.21 लाख |
| 2024 | 4.27 लाख |
| 2025 | 2.45 लाख |
| 2026 | 65 हजार (21 मार्च तक) |
इन आंकड़ों को देखकर यह स्पष्ट हो जाता है कि यह महज किसी एक साल की बात नहीं है, बल्कि छात्रों का बीएड से धीरे-धीरे मोहभंग हो रहा है। इस परिवर्तन के पीछे केवल एक कारण नहीं है, बल्कि कई कारण मिलकर इस बदलाव को अंजाम दे रहे हैं।
4 वर्षीय इंटीग्रेटेड कोर्स बंद होना बड़ा कारण
जयपुर में एक निजी बीएड कॉलेज के संचालक आशीष कुमार के अनुसार इस बार केवल 2 वर्षीय बीएड कोर्स के लिए आवेदन लिए जा रहे हैं, जबकि 4 वर्षीय इंटीग्रेटेड बीए/बीएससी बीएड कोर्स को बंद कर दिया गया है। पहले 12वीं के बाद सीधे इस 4 वर्षीय इंटीग्रेटेड कोर्स में दाखिला लिया जा सकता था, जो छात्रों के बीच काफी लोकप्रिय था। लेकिन अब इस विकल्प के न रहने से उन छात्रों ने दूसरे डिग्री और डिप्लोमा कोर्सों की ओर रुख कर लिया है। आशीष कुमार का मानना है कि जो छात्र 12वीं के बाद 4 साल में एक साथ ग्रेजुएशन और बीएड पूरी कर लेते थे, वे अब इस विकल्प के बंद हो जाने के बाद दूसरे जॉब ओरिएंटेड कोर्स की ओर चले गए हैं।
शिक्षक बनना इतना कठिन क्यों हो गया?
बीएड करने के बाद भी रास्ता इतना आसान नहीं है जितना दिखता है। बीएड पूरी करने के बाद छात्र को REET जैसी प्रतियोगी परीक्षाएं पास करनी होती हैं, फिर विषय के अनुसार भर्ती की प्रतीक्षा करनी होती है। इस पूरी प्रक्रिया में कई साल लग जाते हैं। वहीं सरकारी स्कूलों में शिक्षक भर्ती की प्रक्रिया भी अनिश्चितताओं से भरी होती है। निजी स्कूलों में शिक्षकों का वेतन अपेक्षाकृत कम होता है और करियर ग्रोथ भी सीमित रहती है। ऐसे में जब छात्रों के सामने दूसरे तेज़ रिटर्न वाले विकल्प होते हैं, तो वे स्वाभाविक रूप से उनकी ओर आकर्षित होते हैं।
लॉ में बढ़ता रुझान: CLAT के आंकड़े बोलते हैं
जहाँ बीएड में छात्रों की रुचि घटी है, वहीं लॉ जैसे प्रोफेशनल कोर्स की ओर रुझान लगातार बढ़ रहा है। CLAT (Common Law Admission Test) के आंकड़े इस बदलाव को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं।
| वर्ष | CLAT रजिस्ट्रेशन |
| 2023 | 54,253 |
| 2024 | 71,243 |
| 2025 | 78,914 |
| 2026 | 92,344+ |
CLAT 2026 में 92,344 से अधिक छात्रों ने पंजीकरण कराया, जो इस परीक्षा के इतिहास में सबसे अधिक है। CLAT 2026 में पिछले साल की तुलना में 17 प्रतिशत अधिक आवेदन आए, जो स्पष्ट रूप से दिखाता है कि युवा पीढ़ी में लॉ को लेकर जबरदस्त उत्साह है। इस परीक्षा में अंडरग्रेजुएट प्रोग्राम के लिए 96.83 प्रतिशत और पोस्टग्रेजुएट के लिए 92.45 प्रतिशत उपस्थिति दर्ज की गई, जो यह बताता है कि छात्र सिर्फ रजिस्ट्रेशन नहीं कराते बल्कि पूरी तैयारी के साथ परीक्षा देते हैं।
लॉ क्यों बन रहा है पहली पसंद?
शिक्षाविद् डॉ. हेमलता शर्मा के अनुसार लॉ अब एक बेहतर करियर विकल्प बन गया है, क्योंकि LLB की डिग्री पूरी होते ही किसी भी सीनियर वकील के साथ प्रैक्टिस शुरू की जा सकती है। इसके अलावा कॉर्पोरेट लॉ, साइबर लॉ, टैक्सेशन लॉ और फैमिली लॉ जैसे क्षेत्रों में बड़ी कंपनियां और संस्थाएं अच्छे वेतन पर वकीलों को नियुक्त करती हैं। इसके साथ ही न्यायपालिका में जज बनने का भी मार्ग खुलता है। यही कारण है कि लॉ अब केवल एक पेशा नहीं बल्कि एक संपूर्ण करियर इकोसिस्टम बन गया है।
प्रतियोगी परीक्षाओं की तरफ बड़ा झुकाव
डॉ. हेमलता शर्मा बताती हैं कि आज के विद्यार्थी पारंपरिक कोर्स करने की बजाय सामान्य ग्रेजुएशन के साथ-साथ SSC, UPSC और RPSC जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुट रहे हैं। इस रणनीति का फायदा यह है कि एक ओर डिग्री भी पूरी होती रहती है और दूसरी ओर सरकारी नौकरी की तैयारी भी होती रहती है। राजस्थान में समान पात्रता परीक्षा (CET) के माध्यम से 23 अलग-अलग पदों पर भर्ती होती है और इसमें प्रदेशभर से करीब 20 लाख युवा आवेदन कर रहे हैं। इस आंकड़े से अंदाजा लगाया जा सकता है कि सरकारी नौकरी के प्रति युवाओं का रुझान कितना मजबूत है।
वे कोर्स जहाँ छात्र अब जा रहे हैं
आज का युवा उन कोर्सों की तलाश में है जहाँ “डिग्री के साथ कमाई” का फॉर्मूला काम करे। इस दिशा में कई कोर्स तेज़ी से लोकप्रिय हो रहे हैं:
- आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डेटा साइंस: IT सेक्टर में इन प्रोफेशनल्स की मांग तेजी से बढ़ रही है और शुरुआती सैलरी भी अच्छी होती है।
- एनिमेशन और डिजाइन: मीडिया, गेमिंग और विज्ञापन उद्योग में इस क्षेत्र के विशेषज्ञों की बहुत डिमांड है।
- नर्सिंग और पैरामेडिकल कोर्स: लैब टेक्निशियन, फार्मासिस्ट, ओटी हेल्पर जैसे कोर्स सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों में जल्दी रोजगार दिलाते हैं।
- लॉ (LLB): जैसा ऊपर बताया गया, यह कोर्स अब मुख्यधारा का करियर विकल्प बन गया है।
- मैनेजमेंट (MBA/BBA): कॉर्पोरेट सेक्टर में इन डिग्री धारकों की मांग हमेशा रहती है।
- कंप्यूटर साइंस और सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग: टेक कंपनियों में तेज़ी से बढ़ रहे अवसरों के कारण यह क्षेत्र बेहद लोकप्रिय है।
ये सभी कोर्स इसलिए आकर्षक हैं क्योंकि इनमें डिग्री मिलते ही नौकरी मिलने की संभावना बहुत अधिक होती है।
“लर्निंग के साथ अर्निंग” बनी युवाओं की प्राथमिकता
आज के युवाओं की सोच में एक बड़ा बदलाव आया है। वे अब किसी ऐसे कोर्स में समय और पैसा नहीं लगाना चाहते जहाँ नौकरी मिलने की समयसीमा अनिश्चित हो। बीएड के साथ यही समस्या है। पहले ग्रेजुएशन, फिर बीएड (2 साल), फिर REET परीक्षा की तैयारी, फिर भर्ती का इंतजार। यानी एक शिक्षक बनने तक 6 से 8 साल लग जाते हैं और इसकी कोई गारंटी भी नहीं होती। इसके विपरीत, एक आईटी ग्रेजुएट या नर्सिंग ग्रेजुएट डिग्री पूरी होते ही काम करना शुरू कर सकते हैं।
क्या बीएड का भविष्य खत्म हो गया?
यह सवाल जरूरी है। बीएड की घटती लोकप्रियता का मतलब यह नहीं है कि शिक्षक बनने की कोई वैल्यू नहीं रही। शिक्षा का क्षेत्र हमेशा जरूरी रहेगा और योग्य शिक्षकों की आवश्यकता भी हमेशा बनी रहेगी। लेकिन सरकार को चाहिए कि वह शिक्षक भर्ती प्रक्रिया को सरल, पारदर्शी और समय पर पूरा करे, ताकि बीएड डिग्री धारकों को लंबे इंतजार से न गुजरना पड़े। निजी स्कूलों में शिक्षकों के वेतन और सेवा शर्तों में भी सुधार की आवश्यकता है। अगर इन बातों पर ध्यान दिया जाए, तो बीएड एक बार फिर से छात्रों की पसंद बन सकती है।
भविष्य की शिक्षा नीति पर असर
यह बदलाव केवल छात्रों की पसंद तक सीमित नहीं है। शिक्षाविदों का मानना है कि आने वाले समय में इस बदलाव का असर उच्च शिक्षा की नीतियों और कॉलेज संस्थानों की संरचना पर भी पड़ेगा। राज्य में जो बीएड कॉलेज चलते हैं, उनमें से कई के सामने छात्र संख्या बनाए रखने की चुनौती खड़ी हो गई है। यदि आवेदन इसी तरह घटते रहे, तो कई निजी बीएड कॉलेजों को भविष्य में दूसरे कोर्स शुरू करने या बंद होने की नौबत आ सकती है।